आंकड़ों की मानें तो विशेषज्ञों का मानना है कि वर्तमान में लगभग 4 करोड़ 1० लाख लोग अस्थमा अर्थात् दमा से पीडि़त हैं। इन पीडि़तों में हर आयु वर्ग के लोग शामिल हैं। यद्यपि पहले दमा वयस्क लोगोंं पर अधिक हमला बोला करता था पर अब ऐसा नहीं है। अब तो इस रोग से हर वर्ग के लोग पीडि़त हैं। देश में न जाने कितने ऐसे बच्चे होंगे जो इस रोग से ग्रस्त हैं।
रोग होने के कारण:- यह रोग दिनों-दिन अपनी जड़ें जन-मानस में जमाता जा रहा है। दरअसल इसका कारण तेजी से बढ़ता प्रदूषण, विकृत व आधुनिक-असंयमित खान-पान, भोजन में तैलीय पदार्थों की अधिकता, धूल-धुआं भरे स्थान में अधिक समय तक रहना, लम्बे समय तक सर्दी-जुकाम व खांसी आदि कारणों से दमा शनै:-शनै: अपने पैर जमाने लगता है।
बच्चों में दमा होने का एक मुख्य कारण औषधियों का अत्यधिक प्रयोग भी है। आज-कल के माता-पिता बच्चों को थोड़ा-बहुत जुकाम या खांसी या अन्य व्याधि हुई नहीं कि तुरंत डॉक्टर से दवा लिखवा लाते हैं।
कुछ अभिभावक तो हर समय अपने बच्चों को कोई न कोई दवा खिलाते रहते हैं। परिणामत: उनकी रोग-प्रतिरोधक क्षमता पर ऐसा कुठाराघात होता है कि वे फिर अन्य रोगों के चंगुल में तुरन्त फंस जाते हैं। दमा भी एण्टीबायोटिक्स के अत्यधिक प्रयोग का नतीजा हो सकता है। यह तथ्य अनुसंधानों से प्रमाणित हो गया है।
वैज्ञानिकों ने अपने शोध-निष्कर्षों के उपरांत बताया है कि बच्चों को अगर एण्टीबायोटिक दवाओं से बचाए रखा जाए तो उन्हें दमा के प्रकोप से बचाया जा सकता है। इन रिपोर्टों से स्वत: ही स्पष्ट हो जाता है कि दमा अब बच्चों को भी होने लगा है।
उपरोक्त कारणों के अतिरिक्त अधिक मात्रा में ठण्डा-गरम भोजन करने, मोटापा, आनुवंशिकता, एलर्जी, वसा की अधिकता आदि से भी दमा होने की स्थितियां प्रबल होने लगती हैं, वायरस या जीवाणुओं से श्वसन तंत्र में सूजन, सायनस की सूजन, अत्यधिक मानसिक वेदना आदि कारण भी दमा के अटैक के लिए जिम्मेदार बताए गए हैं।
दमा के लक्षण:- दमा होने पर सांस लेने में तकलीफ होना, सांस फूलना, जुकाम, कफ या बलगम गिरना, सांस में सीटी-सी बजना, नाक जाम हो जाना या नाक बहना, सायनस में सूजन, नाक में मांस बढ़ जाना, अत्यधिक पसीना, थकावट, कमजोरी आदि लक्षण परिलक्षित होते हैं। दमा में प्राय: सांस लेने में दिक्कत ज्यादा आती है। ऐसा फेफड़ों में संक्र मण के कारण होता है।
बचाव हेतु उपाय:- बच्चों के दमा से पीडि़त होने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। दमा से बचाव हेतु निम्न उपायों को अपनाएं।
घर में ऐसी वस्तुओं का संग्रह न करें जिससे धूल-मिट्टी इक_ी होती हो। अत: धूल को इक_ा करने वाली वस्तुओं जैसे फर्नीचर, पर्दो, गद्दों आदि की या तो नियमित सफाई की जानी चाहिए या इनकी संख्या कम रखें।
घर में किसी को दमा होने या बच्चों के पीडि़त होने पर धूम्रपान आदि कतई न करें।
जहां तक हो सके, तीव्र गंधों के प्रयोग से बचें। अगरबत्तियां, मच्छर भगाने वाली अगरबत्तियों का कम से कम प्रयोग करें। तीव्र गन्धों व इत्रों के प्रयोग से फेफड़ों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
बच्चे को भरपूर पानी पिलाते रहें। पानी शरीर के विजातीय द्रव्यों को बाहर निकाल देता है।
बच्चों के खान-पान पर गंभीरता से ध्यान दें। तलीभुनी, मसालेदार एवं तैलीय खाद्य-पदार्थों का कम से कम सेवन करें। अत्यधिक वसा श्वास-नलिकाओं को जाम कर देता है। जिससे सांस लेने में दिक्कत आने लगती है।
व्यायाम के महत्त्व को भी कम नहीं आंका जा सकता। हर संभव बच्चों में नियमित व्यायाम करने की आदत का विकास करें। शवासन, प्राणायाम, सुबह की सैर आदि श्रेयस्कर हैं।
उपरोक्त उपायों के अतिरिक्त बच्चों को हर समय या आए-दिन एण्टीबायोटिक्स दवाओं का प्रयोग कम-से-कम ही कराना चाहिए। यदि किसी प्रकार से रोग नियंत्रण में न आ रहा हो तो तत्काल चिकित्सक से परामर्श लेना चाहिए। आधुनिक अनुसंधानों से स्पष्ट हो चुका है कि अस्थमा या दमा के रोगी में मूल व्याधि श्वास नलिकाओं में सूजन या प्रदाह का होना है। अत: लापरवाही बरतना निस्संदेह घातक हो सकता है।
आकाश अग्रवाल
यूं बचाएं बच्चे को दमा से