एसिड अटैक की शिकार लड़कियां ही क्यों

भले ही हम कितने भी आधुनिक हो गए हैं और महिलाएं पुरुषों से किसी भी क्षेत्र में कम नहीं हैं बल्कि यूं कहें कि वे पुरुषों से भी आगे बढ़ रही हैं तो गलत न होगा लेकिन इसके बावजूद महिलाओं पर होने वाली बलात्कार जैसी घटनाएं बदस्तूर जारी हैं। 
यही नहीं, ऐसी भी बहुत-सी घटनाएं हो रही हैं जिनमें कोई लड़की अगर किसी लड़के के प्रेम का प्रस्ताव स्वीकार नहीं करती तो लड़के के अहं को चोट पहुंचती है और वह उस पर तेजाब फेंक देता है। इसके पीछे उसकी यही मंशा होती है कि लड़की ने उसे अस्वीकार किया है तो वह उसके चेहरे को बिगाड़ दे ताकि उसे भी उस अस्वीकृति का सामना करना पड़े। कुंठित सोच रखने वाले ऐसे लड़के भूल जाते हैं कि आज की लड़कियां कहीं से भी कमजोर नहीं हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि इस प्रकार की घटनाओं में काफी कमी आई है लेकिन अभी भी ऐसी घटनाएं हो रही हैं।
 दुर्भाग्यवश एसिड अटैक की कितनी ही कहानियां हैं हमारे समाज में। समय-समय पर इस विषय को लेकर बहुत-सी कविताएं, लेख छपते रहते हैं। बहुत-से कार्यक्र म भी होते हैं। फिल्में भी बनती हैं। हाल ही में एसिड अटैक पीडि़ता की सच्ची कहानी पर आधारित फिल्म 'छपाकÓ आई थी जिसे दर्शकों ने काफी सराहा था। 
 इसी विषय पर नई दिल्ली स्थित फिल्म प्रोडक्शन कंपनी गोल्डनगेट प्रोडक्शन प्रा. लि. ने हिंदी फीचर फिल्म 'एन एसिड एटैकÓ केस का निर्माण किया है। भले ही यह फिल्म एसिड अटैक पर आधारित है लेकिन इस फिल्म का विषय काफी हटकर है। फिल्म के निर्माता-निर्देशक राहुल राय गुप्ता ने बताया कि फिल्म की कहानी हमारे समाज में होने वाली बलात्कार की घटनाओं, घरेलू हिंसा, लिंगभेद जैसी समस्याओं के इर्द-गिर्द घूमती है। इस बेजोड़ कहानी में एसिड अटैक पीडि़त लड़की बिलकुल नहीं है। उनके मुताबिक इस फिल्म में एक खास संदेश दिया गया है। उनका मानना है कि फिल्मों से हमारा समाज काफी प्रभावित होता है इसलिए उन्होंने फिल्म में सभी घटनाओं को बहुत ही संजीदगी से पिरोया है। 
अशोक गुप्त