बेटी की विदाई का समय जितना कठिन होता है, शायद ही दूसरा कोई समय इतना मुश्किल होता होगा जिसमें एक तरफ उसकी शादी की खुशी होती है, दूसरी तरफ उसके जाने का दर्द। इस समाज की परम्परा भी कितनी निराली है कि अपने यहाँ बेटी को पैदा करके माता-पिता उसे किसी दूसरे घर की लक्ष्मी बनाकर भेज देते हैं और वह हमेशा के लिए वह पराई होकर रह जाती है।
दूसरी तरफ लड़के वालों के यहाँ एक अनजानी दुल्हन का प्रवेश होता है जो उस परिवार के तौर-तरीकों से बिलकुल अनजान होती है। अपने उस परिवार को छोड़कर आना कोई मामूली बात नहीं होती जिसमें उसकी उम्र के बीस-बाईस वर्ष कटे हों। न ही इतना आसान होता है उस अजनबी परिवार को अपनाना जो जरूरी नहीं कि उसके माता-पिता के घर की तरह चलता हो। फिर भी शादियां होती हैं। मां-बाप कलेजे पर पत्थर रखकर, अपनी लाडली को किसी दूसरे घर की रौनक बनाकर भेजते हैं। यह तो सदियों से चली आ रही प्रथा है। इसमें भला कोई क्या कर सकता है? चाहे कोई कितना ही बड़ा राजा क्यों न हो हो, वह भी अपनी जवान बेटी को अपनी दहलीज पर कुवांरी नहीं बिठा सका है।
यह दर्द हर उस माता-पिता का है जिसने बेटी को जन्मा है और हर बेटी का है। यह दर्द सिर्फ आंखों से आंसू के जरिये ही बहाया जा सकता है। इसे बयान करना बेहद मुश्किल है।
हर पिता अपनी बेटी को विदा करते हुए वरपक्ष से यही कहता है कि Óउसने अपनी बेटी को नाजों से पाला है। उससे कोई भूल हो जाये तो उसे क्षमा कर देना। लाड-प्यार से पाली गई बेटी को ऐसे ही किसी के हाथ में नहीं दिया जाता।
माता-पिता यही चाहते हैं कि आगे भी उनकी बेटी को वही लाड-प्यार मिले जो उन्होंने दिया है। वे चाहते हैं कि उनकी बेटी ससुराल में हमेशा खुश रहे। उसकी खुशी की आस लेकर वे अपनी आंखों में पानी लिये उसे ससुराल के लिए विदा करते हैं। माता-पिता की तरह ही अपना बिलखता कलेजा लिये बेटी भी विदाई के गम में गमगीन रहती है। जिस घर में उसने अपने जीवन के इतने बरस बिताये, उस घर को वह हमेशा के लिए छोड़कर कैसे जा सकती है। इस माहौल, को छोड़कर वह किस तरह एक नये माहौल में स्वयं को ढाल पायेगी। उसकी आंखों में अपने आने वाले कल के रंगीन सपने के साथ भाई-बहन से बिछडऩे के गम के आंसू भी होते हैं।
चाहे लाख कोई उसके दिल को तसल्ली दे लेकिन वह अपने बाबुल के आंगन को छोड़कर अपने कदम आगे कैसे बढ़ाए। जहां बचपन में उसने इतने खेल खेले, सबकी दुलारी बनी रही, क्या इतना ही प्यार उसे आगे ससुराल में मिल पायेगा, मां जैसा सास का प्यार, पिता जैसा ससुर का दुलार क्या उसे अजनबी परिवार से मिल पायेगा। इन सवालों से कौंधता उसका मन छलनी हो जाता है और विदाई के समय उसका स्वयं पर काबू ही नहीं रह पाता।
अपना भरा-पूरा परिवार छोड़कर किसी दूसरे घर में जाना बेटी के लिए आसान नहीं। हो सकता है कि उसे अकेलापन निगलने लगे, इसलिए वर पक्ष को यह ध्यान देना जरूरी है कि उसके जो आंसू विदाई के समय आये, उन्हें बार-बार उसकी जिन्दगी में न आने दें। उसकी जिन्दगी में कहीं अकेलापन न भरता चला जाये और वह उस विदाई के समय को याद करके तिल-तिल न जलने लगे, इसलिए उसके पति और ससुरालवालों को तब तक उसका खास ख्याल रखना चाहिए जब तक वह अपने परिवार वालों के लिए अपनापन दिखाना कम न करे।
शिखा चौधरी
क्यों होती है यह विदाई