अयोध्या के राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद के पक्षकारों में प्रमुख सुन्नी वक्फ बोर्ड के चेयरमैन जुफर फारूकी ने बहुत अच्छी पहल की है। उन्होंने कहा सुन्नी वक्फ बोर्ड मस्जिद के लिए जमीन लेने को इसलिए राजी हो गया है ताकि धर्म के नाम पर वैमनस्य फैलाने वाले इस मुद्दे को अब और आगे न बढ़ा सकें। श्री फारूकी कहते हैं कि यह झगड़ा अब हमेशा के लिए खत्म हो जाना चाहिए। अयोध्या में बाबरी मस्जिद और रामजन्म भूमि का विवाद लगभग साढ़े पांच सौ साल से चल रहा था और इसके तहत हजारों लोगों ने बलिदान भी दिया है। विवाद का अंतिम मोड़ 6 दिसम्बर 1992 का दिन था जब लाखो की संख्या में एकत्र हुए राम भक्तों ने उस ढांचे को ही गिरा दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने उस ढांचे को मस्जिद माना और विवादित स्थल को रामलला की जन्मभूमि स्वीकार करते हुए वहां रामलला का मंदिर बनाने के लिए ट्रस्ट का गठन करने का आदेश केन्द्र सरकार को दिया। इसी के साथ सरकार को यह भी आदेश दिया गया कि सुन्नी वक्फ बोर्ड को पांच एकड़ जमीन अयोध्या में ही मस्जिद बनाने के लिए दी जाए। मंदिर बनाने के लिए ट्रस्ट का गठन कर दिया गया है। इसलिए मस्जिद बनाने का कार्य भी शुरू हो जाना चाहिए। मंदिर-मस्जिद दोनों बन रहे हैं तब यह विवाद भी दफ्न हो जाए तो यही सबसे अच्छी बात होगी। विशेष रूप से इसके नामकरण को लेकर सतर्कता दिखानी होगी।
अयोध्या में मस्जिद बनाने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा दी गयी पांच एकड़ जमीन उत्तर प्रदेश सेंट्रल सुन्नी वक्फ बोर्ड ने कबूल कर ली है। इस जमीन को लेकर मुस्लिम वर्ग के कुछ लोग नाराजगी जता रहे थे ओर कह रहे थे कि मुसलमान इतना गरीब भी नहीं है कि मस्जिद के लिए जमीन न जुटा सकें। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद का जब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया था, तभी मुस्लिम वर्ग के कुछ लोगों ने असंतोष जाहिर किया था। सुन्नी वक्फ बोर्ड ने फैसला सुनने के बाद 9 नवम्बर 2019 को ही कह दिया था कि अब वह इस विवाद को लेकर फिर अदालत नहीं जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने सुन्नी वक्फ बोर्ड को पांच एकड़ जमीन दिये जाने का आदेश दिया था मगर इस आदेश को स्वीकार करने या अस्वीकार करने की स्वतंत्रता सुन्नी वक्फ बोर्ड को नहीं दी गयी थी। सुप्रीम कोर्ट की मंशा भी यही थी कि यह विवाद पूरी तरह से तभी सुलझ सकता है जब मंदिर और मस्जिद दोनों का निर्माण हो जाए। यही बात अब सुन्नी वक्फ बोर्ड भी कह रहा है। धर्म के नाम पर झगड़ा कराने वाला यह मामला अब आगे नहीं बढऩा चाहिए और हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो जाए तो इसके लिए वक्फ बोर्ड को कुछ और प्रयास भी करने होंगे। सुन्नी वक्फ बोर्ड की यह पहल तो अच्छी है कि उत्तर प्रदेश सरकार ने जो जमीन मस्जिद बनाने के लिए दी हे, उसे स्वीकार कर लिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का सम्मान करते हुए केन्द्र सरकार ने राम मंदिर निर्माण के लिए श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट का गठन किया तो पांच फरवरी को उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने मस्जिद बनाने के लिए पांच एकड़ जमीन देने के फैसले पर मुहर लगा दी। प्रदेश सरकार ने मस्जिद के लिए केन्द्र सरकार को तीन स्थानों के विकल्प दिये थे। इसके लिए केन्द्र ने बोर्ड को अयोध्या में जिला मुख्यालय से 18 किलोमीटर की दूरी पर धन्नीपुर तहसील सोहावल में थाना रौनाही से लगभग 200 मीटर पीछे भूमि का आवंटन किया है। यहां पर मस्जिद बनायी जाएगी। मस्जिद के साथ ही इस्लामी केन्द्र, अस्पताल व लाइब्रेरी का भी निर्माण कराया जाएगा। इस निर्माण में सरकार से कोई मदद नहीं ली जाएगी। मस्जिद जन सहयोग से बनायी जाएगी। लखनऊ के माल एवेन्यू स्थित सुन्नी वक्फ बोर्ड मुख्यालय में बोर्ड की बैठक चेयरमैन जुफर फारूकी की अध्यक्षता में हुई। इस बैठक में वक्फ बोर्ड के 8 में से 6 सदस्य ही शामिल हुए। इसका मतलब है कि बोर्ड के सभी सदस्य अभी एकमत नहीं हैं। बोर्ड के दो सदस्य इमरान माबूद खान ओर अब्दुल रज्जाक खान ने बैठक का बहिष्कार किया था। राम मंदिर ट्रस्ट को लेकर भी कुछ लोग असंतोष जता रहे हैं लेकिन बहुमत से यह कार्य हो रहे हैं तो कोई बाधा नहीं पड़ेगी। सुन्नी वक्फ बोर्ड की बैठक में फैसला लिया गया है कि ऐसी मस्जिद बनेगी जो सदियों की इंडो इस्लामिक सभ्यता को दर्शाएगी। भारतीय और इस्लामिक सभ्यता के बारे में सम्यक जानकारी और अध्ययन के लिए एक केन्द्र की स्थापना भी की जाएगी। इसके साथ ही एक चैरिटेबल अस्पताल व लाइब्रेरी बनाने का भी फैसला हुआ है। बोर्ड की बैठक का बहिष्कार करने वाले दो सदस्यों अब्दुल रज्जाक खान और इमरान माबूद का कहना था कि शरीयत मस्जिद के बदले कुछ भी लेने की इजाजत नहीं देती। बोर्ड को सरकारी जमीन नहीं लेनी चाहिए। हालांकि यह तर्क भी बेमानी है क्योंकि सरकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले का पालन कर रही है। सुन्नी वक्फ बोर्ड के चेयरमैन जुफर फारूकी, अदनान फारूक शाह, जुनैद सिद्दीकी, सैयद अहमद अली, अबरार अहमद और जुनीद अहमद ने इसीलिए सरकार के प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया है। इस विवाद को जिंदा रखने की कोशिश करने वाले अभी खामोश नहीं बैठे हैं। मुकदमें में वकील रहे बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के संयोजक जफरयाब जीलानी कहते हैं कि अच्छा होता कि सुन्नी वक्फ बोर्ड अयोध्या की उस 67 एकड़ जमीन के दायरे में मस्जिद के लिए जमीन लेता। इसके बारे में सुप्रीम कोर्ट भी 1994 में साफ-साफ कह चुका है। इसके बाद भी सुन्नी वक्फ बोर्ड उस 67 एकड़ जमीन से बाहर क्यों गया? इसी प्रकार यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड के सदस्य अब्दुल रज्जाक खान भी कहते हैं कि पहले मस्जिद गिरायी गयी, फिर उस गिरायी मस्जिद के एवज में दूसरी जगह जमीन ली गयी है, इसलिए मैं इस फैसले का विरोध करता हूं। इस प्रकार मुस्लिम सम्प्रदाय में कुछ लोग हैं जो इस विवाद को दफ्न नहीं होने देना चाहते हैं। अल्पसंख्यक कल्याण राज्यमंत्री मोहसिन रजा ने हालांकि यूपी सुन्नी वक्फ बोर्ड के चेयरमैन को इसके लिए बधाई दी है। उन्होंने कहा बोर्ड का यह फैसला मील का पत्थर साबित होगा। चेयरमैन जुफर फारूकी कहते हैं कि मस्जिद का आकार वहां की स्थानीय आवश्यकता को ध्यान में रखकर किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा था कि मस्जिद के नामकरण पर अभी कोई फैसला नहीं लिया गया है। यह फैसला ट्रस्ट ही करेगा। बेहतर होगा कि कोई ऐसा नाम न रखा जाए जिससे विवाद के जख्म ताजे हो जाएं। बाबर के नाम पर नयी मस्जिद का नामकरण न हो तो बेहतर रहेगा। इसी तरह हिन्दुओं की तरफ से भी अब 6 दिसम्बर को किसी प्रकार के आयोजन की जरूरत नहीं है। इस विवाद ने देश का बहुत नुकसान किया है और अब इसे पूरी तरह से दफनाने की जरूरत है। सुन्नी वक्फ बोर्ड की पहल का स्वागत भी किया जाना चाहिए और वक्फ बोर्ड के जिन 6 सदस्यों ने आगे बढ़कर इस दिशा में कदम उठाया है उनको सरकार की तरफ से पूरी सुरक्षा और प्रोत्साहन भी मिलना चाहिए।
(अशोक त्रिपाठी-हिफी)
सुन्नी वक्फ बोर्ड की अच्छी पहल